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Monday, October 18, 2010

निराशा



माना कि जिन्दगी को
घोर निराशाओं ने घेरा है।
दूर क्षितिज की ओर देखो
आने वाला एक नया सवेरा है।

फैलने दो आशा की किरण को
जिन्दगी रूपी जमीं पर
तुम्हारे आस-पास ही कहीं
तुम्हारी खुशियों का बसेरा है।

क्यों निराश होते हो तुम
ये तो माया जाल है
चन्द दिनों की है ये दुनिया
फिर क्या तेरा और क्या मेरा है।

Friday, October 15, 2010

अर्ज किया है......


(1)
जीते रहे हम जिनकी खुशी के लिए
वो रोने भी न आए मेरे मरने के बाद

(2)
ऐ खुदा किसी को ऐसी खुदाई ना दे
प्यार दे इस दिल में तो जुदाई ना दे

(3)
जो तड.पे ही नही किसी की याद में
वो क्या जाने इन्तजार क्या होता है।
जिसने महसुस ही नही किया दर्द को
वो क्या जाने प्यार क्या होता है।

Thursday, October 14, 2010


कल रात ना जाने क्या बात हुई
तेरी याद आई और बरसात हुई।

शुरू हुए अपने अत्फ के किस्से
जब आपकी और मेरी मुलाकात हुई।

तेरे ही हुस्न का जलाल है ये
विरां सी जिन्दगी भी गुलजार हुई।

तेरे ही अफसाने गुंजते हैं मेरे अंजुमन में
मेरी हर शाम अब तो जश्न-ए-बहार हुई।

Wednesday, October 13, 2010

जॉं लुटाने वाला

युं ही नही मिलता दुनिया में कोई
दिल को लगाने वाला
मुद्दतें बीत जाती हैं
तब जाकर मिलता है कोई
किसी पे अपनी जॉं लुटाने वाला।

Sunday, October 10, 2010

रिश्ता


कुछ तो है तेरे मेरे दरम्यॉं

जो हम कह नही पाते

और तुम समझ नहीं पाते।

एक अन्जाना सा रिश्ता

एक नाजुक सा बंधन

गर समझ जाते तुम तो

मोहब्बत की तासीर से

बच नहीं पाते।

ये कैसी तिश्नगी है

क्या कहंु तुमसे

तसब्बुर में भी तेरे बगैर

हम रह नहीं पाते।

जी रहे हैं हम

नदी के दो किनारों की तरह

जो साथ तो चलते हैं मगर

एक-दूसरे से कभी मिल नहीं पाते।

कुछ तो है तेरे मेरे दरम्यॉं

जो हम कह नही पाते

और तुम समझ नहीं पाते।

Monday, September 27, 2010

सपनों से भी आगे





आओ मेरे साथ
तुम्हें लेकर चलता हूं मैं
सपनों से भी आगे
एक बिलकुल नई दुनिया में।
जहां तेरा प्यार फैला है
आसमां की तरह
हवाओं की जगह फैली है
तेरे जिस्म की भीनी-भीनी सी खुश्बू।
आओ मेरे साथ
तुम्हें लेकर चलता हूं मैं
सपनों से भी आगे
एक बिलकुल नई दुनिया में।
जहां बादलों की जगह
लहरा रही है तेरी जुल्फें
तेरी आंखों जैसी गहराई है समन्दर में
फूलों में चटख रही है
तेरे सुर्ख गुलाबी गालों की रंगत।
आओ मेरे साथ
तुम्हें लेकर चलता हूं मैं
सपनों से भी आगे
एक बिलकुल नई दुनिया में।
जहां दिन शुरू होता है
तेरी एक अंगड़ाई से
पलकों की जुिम्बश से
जहां बिखर जाती है शाम
पंछियों ने सीखा है गाना
तेरी पायल की रूनझुन से
पेड़ों ने फैला रखा है
जहां तेरे आंचल की छांव।
आओ मेरे साथ
तुम्हें लेकर चलता हूं मैं
सपनों से भी आगे
एक बिलकुल नई दुनिया में।

Monday, September 20, 2010

बचपन

मैंने देखा
देश के भविश्य को
कुपोशण से ग्रसित
भुख से रोता-बिलखता हुआ।
पेट की आग को
शान्त करने के लिए
कुड़े और कचरे के ढेर से
रोटियों के टुकड़े ढंुंढता हुआ।
अपनी छोटी मोटी जरूरतों को
पुरा करने के लिए
चोरियॉं करता हुआ।
बदलते मौसम के
थपेड़ों को सहकर
बेफिक्री से फुटपाथों पर
शनै शनै गुजरता हुआ बचपन।
छोटी छोटी खुिशयों में
अपने अस्तित्व को
तलाश करता हुआ बचपन।
चाय की दुकानों, रेहड़ियों पर
झुठे बर्तनों को
साफ करता हुआ बचपन।
जिसके लिए
पुस्तकों का कोई मतलब नहीं
और न ही
स्कूलों के कोई मायने है।
हर उस चीज के लिए
जिस पर उसका
संवैधानिक अधिकार है
तरसता हुआ बचपन।