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Thursday, November 8, 2012

कोई यहॉ हिन्दु कोई मुसलमान रह गया


चित्र गूगल साभार





दिल में तेरी यादों का तुफान रह गया
बस्तियॉ लुट गई सारी खाली मकान रह गया।

जुल्म और नफरत से भर गई दुनिया
इन्सान अब कहॉ इन्सान रह गया।

ताउम्र ख्वाहिशों को ही जीता रहा मगर
दिल में बाकी फिर भी कुछ अरमान रह गया।

इन्सान अब रहा नहीं तेरी दुनिया में ऐ खुदा
कोई यहॉ हिन्दु कोई मुसलमान रह गया।

Monday, October 22, 2012

रावण और हम................

चित्र गूगल साभार



सुबह से ही घर में उधम मच रहा था। बच्चों ने मेला घूमने के लिए सारा घर सर पे उठा रखा था। मैं हैरान परेशान इधर-उधर घूम रहा था। सोच रहा था ‘‘इस महगॉई में ये पर्व त्योहार आखिर आते क्यों है? खैर, जैसे तैसे सबको विदा किया। 
शाम में अकेले-अकेले मैं भी टहलने निकल गया। 
थोड़ी दूर जाने पर मैनें अंधेरे में किसी को छिपते देखा। जब मैं वहॉं गया तो देखा रावण महाराज अपने दस सरों की वजह से छिपने की नाकाम कोशीश कर रहे थे। 
मैने पुछा- ये क्या महाराज! आप यहॉ क्या कर रहे हैं? आपको तो थोड़ी देर के बाद जलना है। 
वो लगभग रोते हुए बोले-भाई अब तो बस करो। सदियों से मुझे जलाते आ रहे हो। आखिर एक गलती की कितनी बार सजा दोगे। वैसे भी आजकल तुम्हारे देश में इतने रावण है कि मेरे कर्म छोटे पड़ जाए। उन्हें पकड़ो और उन्हे जलाओ। मुझे जलाने से तुम्हारा कुछ भला नहीं होगा। पर उन्हे जलाओगे तो तुम्हारे साथ-साथ पुरे देश का कल्याण हो जाएगा। एक सीता हरण का दडं तुमलोग मुझे त्रेता युग से कलियुग तक देते आ रहे हो। क्या ये उचित है? मुझे तो अपनी करनी का फल त्रेता युग में ही मिल गया था। पर तुम लोग हो कि-----। 
आज तो हर घर में, हर मोड़ पर, हर समाज में, हर इंसान में बुराई ही बुराई है। उन्हें खत्म करों और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाओ। पर तुमलोगों से ये तो होगा नही और खामखॉ हर साल मुझे बदनाम करते हुए अपनी कर्मो की सजा मुझे देते हो और खुद पाक-साफ हो जाते हो। 
तभी रामलीला वाले उन्हें ढुढॅंते हुए आए और पकड़कर ले गए खुले मैदान में। राम ने तीर में आग लगाई और चला दिया रावण की ओर। रावण धूॅ-धॅू कर जल उठा। मैदान में ठसाठस भरे हुए लोग खुश हो गए। जैसे रावण के साथ-साथ इस दुनिया की सारी बुराई जलकर राख हो गई हो। लोग वापस अपने-अपने घरों में लौट आए कल से फिर एक नया रावण बनने के लिए।

Monday, October 15, 2012


चित्र गूगल साभार





एक ही दुनिया एक है धरती एक ही है आकाश
फिर क्यों आपस में लड़कर हम खो रहे विश्वास।

मैं हिन्दु तुम मुस्लिम ये सिख वो ईसाई है
एक लहु बहता रगों में फिर कैसी जुदाई है।

ये कैसा अधर्म मचा है देखो चारो ओर
दौलत के पीछे सब अपना लगा रहे है जोर।

कौड़ी कौड़ी जमा किया पर सबकुछ छोड़ कर जाना है
रिश्ते-नाते, धन-दौलत जीने का फकत बहाना है

दुनिया में आए हो तो फिर कुछ ऐसा कर जाओ
गैरों के लिए जी लो या गैरो के लिए मर जाओ।

Tuesday, September 25, 2012

कॉग्रेस की दोरंगी नीति........

चित्र गूगल साभार





सुबह सुबह अखबार पढ़ते हुए एक खबर पर नजर जा कर टिक गई। लिखा था- अब गैस कनेक्शन लेने के लिए उपभोक्ताओं को एजेंसियों के चक्कर नही लगाने पड़ेगें। उपभोक्ता कनेक्शन के लिए सीधे कंपनी के पास ऑनलाईन आवेदन कर सकते है। पढ़कर खुशी हुई। नीचे लिखा था - फार्म में एक कॉलम बना रहेगा उनके लिए जिन्हें गैस पर सब्सीडी नही चाहिए वो यहॉं क्लिक कर बिना सब्सीडी के गैस सिलेंडर ले सकते है। बहुत अजीब लगा। अब आप ही बताईए ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा जो सब्सीडी के तहत गैस लेना नही चाहेगा। हमारे देश में लगभग पचास प्रतिशत मध्यम वर्गीय परिवार होगें। ( मैं ऑकड़ों का सहारा नही ले रहा सिर्फ अनुमान है।) बाकी के पचास प्रतिशत में अमीर, गरीब एवं गरीबी रेखा से नीचे वाले लोग। हजार रूप्ये मध्यम वर्गीय परिवार के लिए काफी मायने रखता है। जहॉॅं पर कोई सामान अगर साढ़े चार सौ में मिल रहा है उसके लिए लगभग हजार रूप्ये कोई क्यों खर्च करना चाहेगा। मेरा मानना है कि सरकार ने जो तीन कड़े कदम उठाए है उनमें से सबसे ज्यादा जानलेवा सिलेंडर पर सब्सीडी को खत्म करने वाला है। सब्सीडी खत्म करने से बेहतर था कि सरकार प्रति सिलेंडर बीस से तीस रूप्ये दाम बढ़ा देती। डीजल मे पॉच रूप्ये की वृद्धी खतरनाक है। अगर सरकार इसे प्रति महीने के हिसाब से बढ़ाती तो शायद इसका असर उतना नहीं होता जितना की अभी हो रहा है। जबसे डीजल के दाम बढ़े है बस के किराये में बीस से पच्चीस फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई है। पॉच से दस किलोमीटर का सफर तय करने के लिए लोगों को प्रति किलोमीटर दुगुने रूप्ये देने पड़ रहे है। आम इंसान हलकान हो रहा है। जहॉ तक मैं समझता हुॅ एफ डी आई  के आने से बड़े शहरों में हो सकता है इसके व्यापक असर सामने आए पर छोटे शहरों, कस्बों और गॉवों में ये अपना असर नहीं छोड़ पाएगा। बिग बाजार, रिलायंस जैसी कंपनियॉ बड़े शहरों तक ही सीमित है। छोटे शहरो और गॉवों में लोगों का दुकानदार के पास उधार खाता चलता है जो बड़ी कंपनियों में संभव नही है। इसकी वजह से इन जगहों के लोग ऐसी कंपनियों को नकार देगें। रह गई बात सिलेडंरों पर सब्सीडी समाप्त करने की। तो सरकार एक और कड़े कदम उठाकर इसकी भरपाई कर सकती है और आम आदमी को राहत दे सकती है। सरकार एक ऐसा कानून बनाए जिसके तहत जितने भी केन्द्रीय और राज्य सरकार के मंत्री हैं उन्हें बिना सब्सीडी का सिलेडंर लेना होगा। इस दायरे में ‘‘ए‘‘ ग्रेड एवं ‘‘बी‘‘ ग्रेड के सरकारी नौकरशाहों और पुंजीपतियों को भी लाना होगा। जहॉ तक मैं समझता हु ऐसे लोगों की संख्या लगभग एक करोड़ के आसपास होगी। ये वो लोग हैं जो बाजार भाव में सिलेडंर लेने में सक्षम है। चार सौ रूप्ये के हिसाब से सरकार को लगभग चार सौ करोड़ रूप्ये की प्रति महीने सब्सीडी में बचत होगी। इन रूप्यों से उन लोगों को फायदा होगा जो सही मायने में इसके हकदार है। पर सरकार ऐसा करेगी नही। वो तो अभी से ही दोरंगी नीति अपना रही है। उसने तो अपने कानून के द्वारा भारत को दो टुकड़ों में बॉट दिया है। एक टुकड़ा वो जो कॉग्रेस शासित प्रदेश है और दुसरा टुकड़ा वो जो कॉग्रेस शासित प्रदेश नही है। हमारे प्रधानमंत्री जी के लिए तो सिर्फ कॉग्रेस शासित राज्यों में ही भारतीय जनता रहती है। तभी तो उन्होनें उन राज्यों में रहने वाले लोगों के लिए सब्सीडी वाले सिलेडंरों की संख्या छः से बढ़ाकर नौ कर दी है। बाकी राज्यों की जनता रोये या हॅसे इससे उन्हें कोई फर्क नही पड़ता। ये कॉग्रेस सरकार का दोगलापन नही है तो और क्या है। क्या एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह का वर्ताव उचित है?  ये भारत देश की बदकिस्मती है कि ऐसे लोग हमारे नेता बने हुए है।

Friday, September 14, 2012

कॉग्रेस का हाथ किसके साथ........


चित्र गूगल साभार

बरसात की एक खुशनुमा शाम। अभी थोड़ी देर पहले ही तेज बारीश हुई जिसकी वजह से हवा में नमी आ गई और पुरे दिन की उमस भरी गर्मी से छुटकारा मिला। अब ऐसे मौसम मे भला किसका दिल रूमानियत से नही भरेगा। इसलिए मैं भी चल दिया ऐसे मौसम का मजा लेने। 
तभी पीछे से अचानक एक आवाज आई - कहॉ चल दिए चन्द्रा बाबु! 
इस आवाज को मैं अच्छी तरह से पहचानता था। मैं समझ गया ‘‘हो गया आज की शाम का बेड़ा गर्क‘‘। मैं पीछे पलटा। मेरे पीछे दुखिया 5 फीट 7 इंच के कैनवस में मुस्कुरा रहा था। 
मैंने पुछा - और बताओ भाई कैसे हो। चाय-वाय पी ली। 
उसने कहा - हॉ जी अभी अभी कलुआ की अम्मा ने नोकिया मोबाईल के साथ चाय पिलाई है। 
मैं हड़बड़ाया। मैने कहा - ये क्या बक रहे हो? अरे बिस्किट के साथ चाय तो सुना था ‘‘ये मोबाईल के साथ चाय‘‘ समझ में नहीं आया। 
आप भी न! जानकर अनजान बनते है चन्द्रा बाबु। 
वो कैसे? मैने कहा। 
उसने कहा- अरे सर जी! जब सरकार मुफ्त में लोगों को रोटी नही बल्कि मोबाईल बॉटेगी तो बिस्किट के साथ चाय कौन पियेगा। अब तो सुबह के नास्ता में सैमसंग, दोपहर के खाने में ब्लैक बेरी, शाम के चाय के साथ नोकिया और रात के खाने में एक अदद सोनी इरेक्सन। 
धड़ाम! ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर ओला गिरा हो। 
मैं खामोश एकदम बुत की तरह और दुखिया राजधानी एक्सप्रेस बना हुआ था। 
अब देखिये हमारे एक नेता जिनका प्रमोशन कर गृह मंत्रालय से वित्त मंत्रालय भेज दिया गया  उन्होंने कहा था - यहॉ की जनता पन्द्रह रूप्ये का आईसक्रीम तो खा सकती है मगर गेहुॅ और चावल में दो रूप्ये की बढ़ोत्तरी बर्दाश्त नही कर सकती। अब भला उन्हे कौन समझाए कि हमलोग एक बार आईसक्रीम खा कर एक महीना गुजार सकते हैं लेकिन एक दिन रोटी खाकर एक महीना कैसे गुजारे। और अब ताजा खबर ये है कि डीजल की कीमत में पॉच रूप्ये की बढ़ोत्तरी हुई है। हमारी भारतीय जनता वैसे भी मॅहगाई की वजह से लंगोट पर जी रही है अब तो ये भी उतरने वाली है। कोढ़ में खाज वाली एक और बात सुनिये- पहले तो सरकार ने हमारी थाली सीमित कर दी अब उन्होने रसोई गैस भी सीमित कर दिया है। यानि की अब साल में सिर्फ छः सिलेडंर मिलेगे। वैसे भी भारत की आधी जनता में वो दम तो रहा नही कि महगांई की वजह से वो दो वक्त का सही से खाना खा सके। इसलिए सरकार ने सोचा कि भाई जब तुम दो वक्त का खाना खा नही सकते तो साल में इतने सिलेडंर ले कर क्या करोगे। इसलिए उन्होनें इसकी संख्या आधी कर दी। 
मैने उसे प्यार से समझाया-देखो सरकार के खजाने खाली है उसे भरने के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा न। सही बात है चन्द्रा बाबु! घोटाले करने के लिए सरकार के पास अरबों खरबों रूप्ये आ जाते है लेकिन जनता के नाम पर उनके खजाने खाली हो जाते है। 
वो एक ठंडी आह भरते हुए बोला- शुक्र है सरकार ने ऑक्सीजन सीमित नही किया है। 
मैने पुछा- क्या मतलब! 
मतलब ये कि अब तो डर लग रहा है कि सरकार कहीं ये न कह दे कि भाई वायु प्रदुषण की वजह से वायुमडंल में आक्सिजन की कमी हो रही है, इसलिए सभी व्यक्ति एक दिन में सिर्फ 100 बार ही सॉस लेगें और जो उससे ज्यादा सॉस लेगा उसे 50 रूप्ये प्रति सॉस की दर से सरकार को टैक्स देना होगा। आप तो कहते थे कि कॉंग्रेस का हाथ आप के साथ। अब खुद कॉग्रेस बताए ‘‘ कॉग्रेस का हाथ किसके साथ‘‘।

Wednesday, August 29, 2012

एक शायर इस जहॉं में गुमनाम रह गया......


चित्र गूगल साभार





मैं उसको ढुढॅंता उम्र-ए-तमाम रह गया
वो चला गया बस उसका नाम रह गया।

सोचता हु समेट लु हर शै को बॉहों में
कहीं अफसोस न हो बाकी कुछ काम रह गया।

जिदंगी को दॉव पर लगाता रहा मगर
हारता रहा मैं नाकाम रह गया।

ऐसा हुआ हश्र मेरी शायरी का बस
एक शायर इस जहॉं में गुमनाम रह गया।


Tuesday, August 21, 2012

साथ रहते भी है और दुश्मनी निभाते है........


चित्र गूगल साभार






हमें मालुम न था लोग इतने बदल जाते है
दर्द देकर औरो को कुछ लोग मुस्कुराते है।

ग़म-ए-जिन्दगानी का फ़लसफ़ा बहुत लबां है
थोड़ा सब्र करो हर्फ-दर-हर्फ सुनाते है।

कैद कर लो ऑसुओं को अपनी ऑखों में
बारीशों में नाले भी दरिया बन जाते हैं।

दोस्ती के मायने अब बदल गए हैं यहॉं
साथ रहते भी है और दुश्मनी निभाते है।