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Wednesday, January 12, 2011

तेरे वफा की कसमें खाते थे कभी हम

चित्र गुगल साभार


तेरे वफा की कसमें खाते थे कभी हम
तेरी जफा से आज जार जार रो रहे है।

पत्थर की दुनिया में पत्थर के लोग होते है
पत्थरों के बुत में हम वफा खोज रहे है।

जब प्यार किया तुमसे तो समझ आया हमें
अपनी राहों में हम खुद ही कॉटें बो रहे है।

अब और न परेशॉ करो मेरी कब्र पे आकर
टुटे दिल को समेटकर हम आराम से सो रहे है।



20 comments:

  1. वाह जी वाह.........बहुत खूब, सुन्दर रचना.....आभार

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  2. पत्थर की दुनिया में पत्थर के लोग होते है
    पत्थरों के बुत में हम वफा खोज रहे है।

    लाज़वाब..बहुत खूबसूरत..

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  3. अमित भाई सुन्दर रचना,

    जब प्यार किया तुमसे तो समझ आया हमें
    अपनी राहों में हम खुद ही कॉटें बो रहे है।

    दिल मे उतर गयी

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  4. अच्छा प्रयास है ....शुभकामनायें !

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  5. अमितजी ,

    हर शेर जुदा-जुदा ......अपनी बात कहने में सक्षम |

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  6. शानदार गजल!
    लोहड़ी और उत्तरायणी की सभी को शुभकामनाएँ!

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  7. अब और न परेशॉ करो मेरी कब्र पे आकर
    टुटे दिल को समेटकर हम आराम से सो रहे है।
    लाज़वा,बहुत खूबसूरत......

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  8. तेरे वफा की कसमें खाते थे कभी हम
    तेरी जफा से आज जार जार रो रहे है।

    बेहतरीन ग़ज़ल... ज़बरदस्त!

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  9. तेरे वफा की कसमें खाते थे कभी हम
    तेरी जफा से आज जार जार रो रहे है।

    वाह वाह ,क्या बात है

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  10. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें!

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  11. बहुत ही सुंदर रचना.....बधाई...

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  12. @-जब प्यार किया तुमसे तो समझ आया हमें
    अपनी राहों में हम खुद ही कॉटें बो रहे है..

    अफ़सोस , अक्सर ऐसा ही होता है।

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  13. अब और न परेशॉ करो मेरी कब्र पे आकर
    टूटे दिल को समेटकर हम आराम से सो रहे है।

    बहुत वज़नदार शे‘र कहा है आपने।
    इन दो पंक्तियों में आपने एक उपन्यास-सा लिख दिया है।

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  14. लाज़वाब..बहुत खूबसूरत| धन्यवाद|

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