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Friday, October 25, 2013

एक औरत हुँ मैं........

चित्र गूगल साभार




रचयिता हुँ मैं
तुम्हारी जिदंगी की।
मेरी कोख में ही तुम्हारी
नई कोपलें सृजित होती है।
सींचती हुँ  उन्हें
मैं अपने रूधिर से।
रंग भरती हुँ  मैं
तुम्हारी बेरंग जिन्दगी में।
कभी मॉं बनकर
तुम्हें दुलारती हुँ
कभी बहन बनकर
तुम्हें सवॉंरती हुँ ।
तो कभी बेटी बनकर
तुम्हारी जिदंगी को परिपूर्ण करती हुँ ।
फिर भी
जन्म-जन्मातंर तुम्हारे हाथों
प्रताड़ित हुई हुँ  मैं।
आखिर क्यों
क्षणिक आवेश में आकर
हैवानियत से भरा
कुकर्म करते हो।
कभी जन्म से पहले ही
हमारा कत्ल करते हो।
तो कभी
हमारी अस्मत और
संवेदनाओं को
तार-तार करते हो।
कभी दहेज के नाम पर
हमें जिंदा जलाते हो।
कभी अपनी हवस की खातिर
हमारा व्यापार करते हो।
शायद तुम्हें नही पता
तुम अपने हाथों ही
अपनी जड़ें काट रहे हो।
अगर मैं ना रही
तो बिखर जाओगे।
फिर मॉं, बहन, बेटी
और पत्नी
कहॉं से पाओगे।
आखिर कबतक समझोगे तुम
देवी हुँ 
सवर्दा पूजनीय हुँ  मैं
हॉं, एक औरत हुँ  मैं।

15 comments:

  1. बहुत सुंदर अमित जी स्त्री के विभिन्न रूपों में भी गज़ब का सामंजस्य है ... बहुत दिनों बाद को पढ़ा.. मेरे भी ब्लॉग पर आये

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    1. वक्त की थोडी कमी है इसलिये ब्लाग पर कम वक्त दे पाता हुँ.

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  2. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने..

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  3. आखिर कबतक समझोगे तुम???
    ऐसी ही सोच अगर हर पुरुष में आ सके तो शायद मिल जायेगा इस प्रश्न का उत्तर … सार्थक अभिव्यक्ति

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  4. बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना...

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  5. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  6. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (27-10-2013) के चर्चामंच - 1411 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  7. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  8. गहरी सोच से उपजी रचना ...
    काश हर पुरुष की मनःस्थिति बदल सके ...

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  9. बेहतरीन और लाजवाब ।

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