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Saturday, December 4, 2010

बाल मजदूर

कुछ दिनों पहले मैं अपने एक दोस्त से मिलने जा रहा था। सुबह का समय था मैनें देखा कि तीन छोटे छोटे बच्चे जिनकी उम्र लगभग बारह साल के आस पास होगी मिट्टी के ढेर को टोकरी में उठा कर दूसरी जगह रख रहे थे।तभी मेरे दोस्त ने बताया कि तीन दिनों के अन्दर इनलोगों ने लगभग चार ट्राली मिट्टी की ढुलाई कर दी है। इनकी ये अवस्था काफी कुछ बयान करती है।


कुदरत ने इसके साथ ये कैसा मजाक किया है
कलम की जगह इसने हाथों में कुदाल लिया है।

लड़ते हैं ये रोज दुनिया से रोटी के वास्ते
बड़े ही दुर्गम और कॉटों से भरे है इनके रास्ते।

कुछ तो पिज्जा और बर्गर से भी मुहं फेरते है
ये मासुम बच्चे सिर्फ दो रोटी को तरसते है।

सामने आ भी जाए तो हम इन्हें दुत्कारते है
बगल में बैठे कुत्ते को हम प्यार से पुचकारते है।

इनकी बेबसी हमें बहुत कुछ सोचने को मजबुर करती है
इन मासुमों की जिन्दगी क्या कुत्तों से भी गई गुजरी है।


17 comments:

  1. दिल को छूने वाली रचना.....आपका साधुवाद.

    स्वंय कि बडाई के लिए नहीं, वरन दूसरों को प्रेरित करने के लिए बता दूँ कि मैं मेरे गांव के दो गरीब छात्रों के अध्धयन का पूर्ण खर्च वहन करता हूँ.

    पुनः साधुवाद

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  2. .......बहुत सुन्दर और मार्मिक कविता है

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  3. bahoot hi marmik evam dil ko chhoo lene vali post kavita .

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  4. .

    हमारे देश में गरीबी , इन बच्चों से उनका बचपन छीन रही है। कहीं करोड़ों के घोटाले हैं , तो कहीं दो जून की रोटी के भी लाले हैं।

    .

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  5. अमित भाई सुन्दर और भावपूर्ण रचना के लिए शुभकामनायें
    हमारे देश मे बाल मजदूरी एक विकट समस्या है आपने इस ओर ध्यान दिया इसके लिए आभार

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  6. ब्‍लॉग्‍स की दुनिया में मैं आपका खैरकदम करता हूं, जो पहले आ गए उनको भी सलाम और जो मेरी तरह देर कर गए उनका भी देर से लेकिन दुरूस्‍त स्‍वागत। मैंने बनाया है रफटफ स्‍टॉक, जहां कुछ काम का है कुछ नाम का पर सब मुफत का और सब लुत्‍फ का, यहां आपको तकनीक की तमाशा भी मिलेगा और अदब की गहराई भी। आइए, देखिए और यह छोटी सी कोशिश अच्‍छी लगे तो आते भी रहिएगा


    http://ruftufstock.blogspot.com/

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  7. "इनकी बेबसी हमें बहुत कुछ सोचने को मजबुर करती है
    इन मासुमों की जिन्दगी क्या कुत्तों से भी गई गुजरी है"
    बहुत मार्मिक.ये हमारे देश की विडम्बना है की जिन हाथों में किताब और क़लम होनी चाहिए उन हाथों में फड़वा और कुदाल है.
    मेरा एक दोहा है:-
    नन्हे-मुन्नों का उठा,जीवन से विश्वास.
    होटल में बच्चे दिखे,धोते हुए गिलास.

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  8. मैं इसे रोकूंगा ईसा संक्लप चाहिए

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  9. haan bal mazdoori ko khatm kiye bina hamaara samaaj mature nahi ho sakta...

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  10. लड़ते हैं ये रोज दुनिया से रोटी के वास्ते
    बड़े ही दुर्गम और कॉटों से भरे है इनके रास्ते।
    xxxxxxx
    बहुत मार्मिक रचना ...सोच कर अनुभव हुआ की दुनियां का रंग कैसा है .....शुक्रिया

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  11. बहुत सुन्दर मार्मिक रचना !

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  12. marmik rachna , hamko jhakjhhorti hai kuchh karo
    aur ham chup hai taras aata hai aapne aap par

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  13. Sunil bhai baat aapki sahi hai. ye ek aadmi ki zimmedari nahi banti hai. sabhi jagruk logo ko aage badna hoga tabhi ja kar ye ruk payega. tippni karne ke liye dhanyabad.

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  14. वाकई !! ये बच्चे ज़मी से चूम कर उठाने लायक होते हैं
    -लोरी

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