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Tuesday, December 14, 2010

जिन्दगी

चित्र santabanta.com साभार

जिन्दगी आउगॉं कभी
तुमसे मिलने के लिए
अभी उलझा हॅु मैं
अपनी उलझनें सुलझाने में।
जो छोड़ी है सिलवटें तुमने
मेरे चेहरे पर
उन सभी का बारी बारी
हिसाब करने।
जिन्दगी आउगॉं कभी
तुमसे मिलने के लिए।
सुना है
तुम और वक्त मिलकर
खुब उधम मचाते हो।
क्या अमीर और क्या गरीब
सभी को एक समान सताते हो।
बालों की सफेदी और
झुकी हुई कमर
तेरी जुल्मतें बयॉं करती है।
तेरे साथ साथ अब
वक्त भी लोगों पर
हॅंसा करती है।
कोई तो आएगा
जो तुमसे
अपनी नजरें मिलाएगा
उस दिन मैं भी
तुम पर मुस्कुराउगॉं।
जिन्दगी आउगॉं कभी
तुमसे मिलने के लिए
अभी उलझा हॅु मैं
अपनी कुछ उलझनें सुलझाने मे।

16 comments:

  1. ye hui na koi baat
    aao kar len zindgi se bhi do-do hath!
    badi dileri ki rachna hai amitji..

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  2. जो छोड़ी है सिलवटें तुमने
    मेरे चेहरे पर
    उन सभी का बारी बारी
    हिसाब करने।
    जिन्दगी आउगॉं कभी
    तुमसे मिलने के लिए।...

    बहुत गहरे अहसासों से पूर्ण प्रेरक प्रस्तुति...आभार

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  3. अमित भाई,
    गजब का लिखा है।
    कविता की जितनी तारीफ करू उतनी कम है

    जिन्दगी से मिलने जब जाओ तेा अपने इस छोटे भाई को भी आवाज लगा लेना।
    अपनी भी हसरत है जिन्दगी से दो बात करने की।

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  4. अमित जी, सुन्दर प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

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  5. अमित जी जी....... बहुत ही प्यारे एहसाह भरे है कविता में... सुंदर प्रस्तुति

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  6. जिन्दगी आउगॉं कभी
    तुमसे मिलने के लिए
    अभी उलझा हॅु मैं
    अपनी उलझनें सुलझाने में।
    अपनी ज़िंदगी तो इसी में निकाल गयी अमित जी, खुबसूरत अहसास

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  7. सुना है
    तुम और वक्त मिलकर
    खुब उधम मचाते हो।
    क्या अमीर और क्या गरीब
    सभी को एक समान सताते हो//
    Really amit//
    great yaar //

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  8. जिन्दगी आउगॉं कभी
    तुमसे मिलने के लिए
    अभी उलझा हूँ मैं
    अपनी कुछ उलझनें सुलझाने मे।

    बहुत ही बेहतरीन रचना... बधाई!



    प्रेमरस.कॉम

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  9. सुना है
    तुम और वक्त मिलकर
    खुब उधम मचाते हो।
    क्या अमीर और क्या गरीब
    सभी को एक समान सताते हो।
    बालों की सफेदी और
    झुकी हुई कमर
    तेरी जुल्मतें बयॉं करती है

    ज़िन्दगी और वक़्त की बेरहमियां बयान करती सुन्दर पोस्ट.

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  10. क्या बात है ,लाजबाब

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  11. aap sabhi ka dhanyabad hausla afzai ke liye.

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  12. achhaa kaavya hai
    padhne ko
    mn kartaa hai

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  13. जिन्दगी को कई अहसासो को समेटती रचना के लिये बधाई ।

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  14. 3/10

    यह कविता तो जरा भी नहीं लगी
    हाँ..भाव अवश्य पहुंचे
    आप गद्य में लिखें तो बेहतर है
    आभार

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  15. जिंदगी है तो उलझने भी है, उन्हें सुलझाते हुए ही जिंदगी जीनी है.

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